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एकादशी व्रत कथा - Ekadashi Vrat Katha in Hindi
एकादशी व्रत कथा - Ekadashi Vrat Katha in Hindi

एकादशी व्रत कथा – Ekadashi Vrat Katha in Hindi

एकादशी व्रत – Ekadashi Vrat

वर्ष में २४ एकादशी होती है तथा अधिक मास में २ कुल २८ एकादश to होती है, उनके नाम यह है – १. उत्पन्ना, २, मोक्षदा३. सकता ४. पुत्रदा, ५. जया, ६. विजया, ७. पापमोचनी, ८. कामदा, ई. मोहिनो१०. योगिनो, ११. पवित्रा, १२. पुत्रदा१३. अजा, १४इन्दि, १५रमा, १६. पापांकुशा, १७. देवशयनी, १८, सफता, १६. निर्जला, २०. आमतकी, २१ परियसिनी, २२ . देवोल्यानी, २३, वयिनी २४. कामदा। इन नामो के अतिरिक्त अधिक मास में पद्विानी और परमा ये दो एकादशी होती है। यह नामानुसार फल देती है ।

एकादशी व्रत कथा – Ekadashi Vrat Katha in Hindi

श्री सूत जी महाराज ब्राह्माणो से बोले हे ब्राह्माणों : इस विधि युक्त उत्तम माहात्म्य को श्रीकृष्ण जी ने कहा था, विशेष कर जो इस व्रत की उत्पत्ति भक्ति से सुनते है वह इस लोक में अनेक प्रकार के सुख भोग कर अन्त मे दुष्प्राप्य विष्णुलोक को पाते है । पूर्व काल में श्री भगवान् ने अर्जुन के प्रति एकादशी व्रत को उत्पत्ति विधि इत्यादि को थो सो उन्हो के कथोपकथन रूप से मैं कहता हूं । अर्जुन ने पूछा कि हे जनार्दन ! जो रात्रि में उपवास करते है तथा एक समय भोजन करते है उन्हे कैसा पुण्य मिलता है और उस उपवास करने को विधि क्या है?so अब आप कृपा करके कहिए , यह सुनकर श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा कि सबसे प्रथम दशमी की रात्रि को दन्तधावन करे अर्थात दिन के आठवे प्रहर में जब सूर्य का तेज मन्द पड़ जाय तब दतधावन करना चाहिए और रात्रि को भोजन न करे, पुनप्रातःकाल | निश्चिन्त चित्त होकर संकल्प करे, मध्यान्ह में भी संकल्प पूर्वक स्वान करे । नटो, तालब और बापी कूप आदि में स्नान करना चाहिए। स्नान के पहले मृत्तिका स्नान अथत मिट्टी का चन्दन लगाना चाहिए ।

स्नान करके व्रती पुरूष पतित, चोर, पाखंडी, मिथ्या दूसरो का अपवादकरने वाला, देवता, वेद और ब्राह्मणो की निन्दा करने वाला और जो अगम्या गमन करने वाला, दुराचारी परदव्य चुराने वाला इन सब से बात न करे, यदि देवत् इनको देखले तो इस पाप को दूर करने के लिए सूर्य को देखे । स्नान के अनन्तर सादर नैवेद्य आदि अर्पण करे । उस दिन निंदा और मैथुन न करे । दिन तथा रात्रि नृत्य गायन आदि सद्वारता से बिताए । भक्ति युक्त होकर ब्राह्मणों को दक्षिणा दे और प्रणाम पूर्वक उनसे अपनी त्रुटि की क्षमा मांगे I शुक्लपक्ष की और कृष्णपक्ष की एकादशी दोनो धार्मिको के लिए समान है, इन दोनो एकादशी से भेद बुद्धि उचित नही है। इस प्रकार जो एकादशी व्रत करते है उन मनुष्यों को खोद्दार तीर्थ में स्नान करके भगवान् के दर्शन से जो पुण्य प्राप्त होता है वह एकादशी व्रत के पुण्य के सोलहवे हिस्से के भी बराबर नही है, व्णतीपात योग मे सक्रांति समय मे, चन्द-सूर्य ग्रहण मे, कुरूक्षेत्र में स्नान से जो फल प्राप्त होता है, वह सब एकादशी के व्रत करने से मनुष्य को प्राप्त होता है ।अश्वमेघ यज्ञ करने से जो फल होता है उससे सौ गुना अधिक पुण्य एकादशी व्रत से होता है ।

जिस मनुष्य एक सहस्त्र तपस्वी साठ हजार वर्ष भोजन करे, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है सो एकादशी व्रत से भी होता है । वेद वेदांग पूर्ण ब्राह्मण को एक हजार गौदान करने से जो पुण्य होता है उससे दस गुना अधिक पुण्य एकादशी व्रत से होता है। दस उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य होता है। उससे दस गुना अधिक पुण्य एकादशी व्रत से होता है। दस उत्तम ब्राह्मणो को भोजन कराने से जो पुण्य होता है। उससे दस गुना अधिक ब्रह्मचारियो के भोजन से होता है इससे हजार गुना अधिक खन्या और भूमिदान से पुण्य है इससे दस गुना अधिक विद्यादान शे पुण्य है, विद्या दान से दस गुना पुण्य भूखे को अनन देने से होता है। अन्न दान के बराबर और दूसरा पुण्य नही है।

इसके द्वारा स्वर्गीय पितर तृप्त होते है इसके पुण्य का प्रभाव देवताओ को भी जानना दुर्लभ है। नत्तव्रत करने का आधा फल एक भुक्त व्रत से होता है। एकादशी को इनमे से कोई करना चाहिए। तीर्थ तभी तक गर्जना करते है, दान नियम यम अपने फल की तभी तक घोषणा करता है, यज्ञो का फल तभी तक है जब तक की दस एकादशी प्राप्त नही हुई है। इस कारण अवश्य एकादशी व्रत करना चाहिए। शंख से जल नही पीना छाहिए । मछली और सूआ नही खाना चाहिए और अन्न नही खाना चाहिए, एक एकादशी के समान हजार यज्ञ भी नही है। अर्जुन ने पूछा हे देवआप इस तीर्थ को सब तीर्थों से श्रेष्ठ तथा पवित्र कहते है। इसमें क्या कारण है ? भगवान् ने कहा कि- पहले सतयुग मे मुर नामक एक भयंकर दैत्य था जिस के भय से सभी देवता भयभीत थे। उसने इन्द्र आदि सभी देवताओ को जीतकर उन्हे उनके स्थान से भ्रष्ट कर दिया था। तब इन्द ने महादेव जी से कहा कि- हम लोग इस समय मुर दैत्य के अत्याचार से पीड़ित होकर मृत्णुलोक मे अपना काल बिता रहे है और देवताओ की दशा तो कही नही जाती सो कृपा करके इस दुःख से छूटने का उपाय बतलाइये। श्री महादेव जी ने कहा कि देवो के राजा इन्द आप भगवान् विष्णु के पास जाइये । महादेव जी के वचन को सुनकर देवराज इन्द्र देवताओ को साथ लेकर क्षीर सागर में जहां जगत्पति जनार्दन सोये थे, बहाँ गये। भगवान को सोये देखकर इन्द ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की- हे देवताओ के देख ! हे देवपूजित ! आपका नमस्कार है। दैत्यो के नाशक मधुसूदन ! हे पुंडरीकाक्ष ! आप हम लोगों को रक्षा करे। है जगन्नाथ ! दैत्यो से डरकर सब देवता मेरे साथ आपकी शरण में आए है। आप हम लोगो की रक्षा करे । आप इस जगत् के स्थिति कर्ता, उत्पत्तिकर्ता और संहारकर्ता है। आप देवताओ के सहायक है । तथा उन्हे सुख देने वाले है। आप पृथ्वी है, आकाश है और संसार के प्राणियो के उपकारक है। आप ही संसार है तथा सम्पूर्ण त्रिलोकया की रक्षा करने वाले है। आप देवताओ के सहायक है तथा उन्हे सुख देने वाले है। आप ही सूर्यचन्द्रमा, अग्नि, हव्य, मन्त्र, तन्त्र, यजमान, यज्ञ और समस्त कर्म फल भोक्ता ईश्वर भी है। इस सम्पूर्ण जगत मे ऐसा कोई स्थान नही है जहाँ आप न होवे । हे शरणदः ! आये हुआ के रक्षक हे देव- देव भगवान् ! आप हम लोगो की रक्षा करे । इस समय दानवो ने देवताओ को जीत लिया है और उन्हे स्वर्ग से निकाल दिया है, अब देवता लोग अपने स्थान को छोड़कर भूमि मे मार-मारे फिरते है, आप ही उन सबके रक्षक है। इस प्रकार से इंद्र के वचनो को सुनकर भगवान बोले कि- वह कौन दैत्य है ? जिसने देवो को जीता है। वह कहां रहता है, उसका नाम क्या है और उसका बल क्या है ? हे इन्द ! यह सब विस्तार पूर्वक कहिए तथा भय छोड़ दो यह सुनकर इन्द कहने लगे कि हे देव! पहले एक बड़ा भारी नाड़ीजंघ नामक दैत्य था। जिसकी उत्पत्ति ब्रह्मवंश में थी और अपने बल से गर्वित होकर देवो को सर्वदा पीड़ित करता था। उसी का पुत्र मरू नामक दैत्य है जिसकी राजधानी का नाम चन्द्रावती है। वह नगरी अति सुन्दर है। वह दैत्य उपने प्रखर वीर्य से सम्पूर्ण विश्व को जीत कर और देवताओ को देवलोक से निकाल कर इन्द, अग्नि, यमवरूण और चन्दमा आदि लोकपाल स्वयं बन बैठा है, स्वयं सूर्य बनकर जगत को तपा रहा है, स्वयं पर्जन्य मेघबन गया है। इस कारण आप देवताओ के लिए दर्द के लिए दर्दनीय दानव को मारकर देवताओ को विजयी बनाये।

श्री भगवान् इन्द्र से अत्याचार सुनकर अत्यन्त कुद्ध हुए तथा इंद्र को सम्बोधन करके बोले कि- देवेन्द ! अब मैं आप लोगो को शभय से शीघ्र ही निर्मूल करूंगा और हे बलशाली देवो ! आप लोग सब मिल चन्द्रावती पुरी को जाओ। यह कह श्री भगवान् भी पीछे-पीछे चन्द्रावती को गए। वहां जाकर देखा कि दैत्याधिप मुरू अनेक दैत्यो से परिवेष्टित होकर संग्राम भुमि मे गरज रहा है। युद्ध प्रारंभ होने पर असंख्यात सहस्र दानव दिव्य अस्त्र शस्त्रो से सुसिज्जत होकर लड़ने लगे। अंत में देवता लोग दानवो से लड़ न सके तब दैत्यो ने देखा कि ह्वाषिकेश भगवान् रणभूमि में उपस्थित है । उन्हे देखकर अनेक दैत्य अस्त्र-शस्त्र से उन पर टूट पड़े। जब भगवान ने देखा कि देवता भाग गये है तब शंख चक्र गदाधारी भगवान् अस्त्र-शस्त्रो से राक्षसो का वद्ध करने लगे। उन सर्प समान अस्त्रो से विद्ध अनेक दानव इस लोक से चिरदिन के लिए प्रस्थत हुए परन्तु दैत्याधिप निश्चल भाव से युद्ध करता रहा । भगवान् जिनजिन अस्त्रो का प्रयोग उस पर करे वह सब उसके तेज से कुण्ठित होकर पुष्प के समान उसके अंगों मे मालूम पड़ते थे। अनेक शस्त्रो के प्रयोग उस पर करे वह सब उसके तेज से कुण्ठित होकर पुष्प के समान उसके अंगो मे मालूम पड़ते थे। अनेक शस्त्रो के प्रयोग करने पर भी जब भगवान् उसको न जीत सके तो तबकुद्ध होकर परिघ तुल्य बाहुओ से मल्ल युद्ध करने लगे। देवताओ के हजार वर्ष भगवान् ने उससे युद्ध किया परन्तु वह नही हारा। तब भगवान् शांत होकर विश्राम करने की इच्छा से बदरिकाश्रम चले गए । वहा अवतालीस कोस की लम्बाई मे विस्तृत और एक द्वार युक्त हेमवती नामक गुफा मे शयन करने के अर्थ भगवान् ने प्रवेश किया। हे धनजय ! मै उस गुफा में सोया था। ड्रह दानव भी मेरे पीछे-पीछे उस गुफा मे चला उाया और मुझे सोता देखकर मारने के लिए उद्यत हुआ। वह समझता था कि आज मै दानवो के चिर शत्रु इनको मारकर उन्हे निष्कण्टक बनाईं । उसी समय मेरे शरीर से अ अत्यन्त सुन्दरी दिव्य अस्त्र लिए एक कन्या उत्पन्न होकर दानवराज के सन्मुख युद्ध के लिए उपस्थित हुई। दानवेन्द उससे युद्ध कइने लगा और युद्ध में उसकी निपुणता देखकर सोचने लगा कि इस रूदास्वरूप स्त्री को किसने बनाया जिसके बाण बर्जी के समान है। पुन: उन दोनो मे घमासान युद्ध आरम्भ हुआ। इस मुहूर्त में ही उस कन्या ने दानव राज के अस्त्र शस्त्रो को काटकर उसे रथहीन कर दिया। बह दानव विरथ और निशस्त्र होकर आक्रमण करने के लिए दौड़ा परन्तु भगवती ने उसे मुष्टिक मारकर जमीन पर गिरा दिया। पुन: उटकर कन्या को मारने की इच्छा से दौड़ा, उसे आते देखकर भगवती ने उसका सिर धड़ से अलग करके उसे यमलोक को भेज दिया और उसके साथी भयभीत होकर पाताल को चले गये । तब भगवान् उठे और सामने हाथ जोड़ खड़ी हुई उस कन्या को देखकर परम प्रसन्न हुए और बोले कि सम्पूर्ण देव गन्धर्व नाग लोकेश सभी को जीतने वाले इस दुष्ट दानव को रण में किसने मारा है ? जिसके भय से मैने इस कन्दरा का आश्रय लिया था सो किसने कृपाकर मेरी रक्षा की है। कन्या ने उत्तर दिया कि- हे प्रभो! आपको सोया देखकर वह आपको मारना चाहता था कि आपके अंश से उत्पन्न हुई मैने ही इस दानव का संहार करके देवताओ को निर्भय किया है। मै सर्व शुभदमनकारिणी आपको ही महाशक्ति हूं । हे प्रभो ! आप बतलाइए कि इसके मारने से आपको क्यो आश्चर्य हो रहा है ? भगवान् बोले कि- हे निष्पाप! इस दानव को मारने मे तुझ पर मै अत्यन्त प्रसन्न हूँ इस समय सभी देवता अत्यन्त हर्षित हो गये है और तीनों लोकों में इस समय आन्नद छा रहा है। अतएव निस्संकोच होकर तुम्हारी जो इच्छा हो सो वर मांगो । स्मरण रखो कि देवताओ को दुर्लभ वर भी तुम मांगोगी तो मैं तुम्हे दूँगा । कन्या बोली कि भगवान ! यदि आप मझ पर प्रसन्न है और यदि वर देना चाहते है तो मुझे वह वर दीजिए कि यदि कोई उपवास करे तो मैं उसके पापों से उसे तारने में समर्थ हो और उपवास से जो पुण्य होता है उससे आधा रात्रि भोजन में होने और उसका आधा पुण्य एक संध्या में भोजन करने वालो को हो । जो मेरे दिन को जितेन्द्रिय भक्ति युक्त होकर उपवास करे सो विष्णु धाम को प्राप्त हो और अनेक कोटि वर्ष तक वह वहां अनन्त सुख भोगे । भगवन् ! यदि आप प्रसन्न है तो यही वर दीजिए। यह सुनकर भगवान् बोले कि हे कल्याणि ! जो तुम कहती हो वह सत्य हो। जो हमारे और आपके भक्त है उनकी कीर्ति जगत में प्रसिद्ध होगी तथा वे मेरे समीप वास करेंगे । हे मेरी उत्तम शक्ति तुम एकादशी तिथि को उत्पन्न हुई हो इस कारण तुम्हारा नाम भी एकादशी होगा। एकादशी उपवास करने वाले के सम्पूर्ण पापो को दूरकर मै उन्हे उत्तम गति ढूंगा। विशेष कर अष्टमी चतुर्दशी एकादशी ये तिथियाँ मुझे अत्यन्त प्रिय है। हे पार्थ ! सब तीर्थर्यों से, सब दानो से, सब व्रतो से आधिक पुण्य एकादशी तिथि से है।विष्णु भगवान इतना वर दे वही अनतध्र्यान हो गये और एकादशी तिथि भी वर पाकर परम संतुष्ट तथा हर्षित हुई। है अर्जन जो मनष्य एकादशी का व्रत करते है मै उनके शत्रुओं को नाश करके अवश्य उत्तम पद देता हू। इस प्रकार एकादशी की उत्पत्ति हुइ है। यह नित्य एकादशी व्रत सब पापो को नाश करने वाला है I सब पापो की दूर करने और सब प्रकार कै मनोरथ सिद्ध करने के लिए यह एक तिथि प्रसिद्ध है। शुक्ल पक्ष की एकादशी अथवा कृठणपक्ष की एकादशी इन दोनो मे भेद करना उचित नही दोनी सामान है I जो एकादशी का महत्व जो सर्वदा श्रवण या पठन करते है उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है । जो विष्णु परायण मनुष्य दिन रात विष्णु द्धारा विष्णु की कथा सुनते है वह अपने’ कोटि परुष के साथ विष्ण लोक मे जाकर पूजित होते है । जो एकादशी महात्म की चतुर्थयार्थ भी श्रवण करता है उसके ब्रह्म हत्यादिक पाप छूट जाते है। विष्णु धर्म के समान धर्म नहीँ है और एकादशी व्रत के समानं दूसरा व्रत नहीँ है ।

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